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गुरुवार, 24 अप्रैल 2014

बुद्धिवर्धक कहानियाँ - ( ~ सच्चा साथी ~ ) - { Inspiring stories - part - 6 }

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बुद्धिवर्धक कहानियाँ - भाग - ६ पे आप सबका हार्दिक स्वागत है , भाग - ५ की कहानी तो आपने पढ़ी ही होगी , अगर नहीं तो यहाँ पे क्लिक करेंतो आइये अब चलते है आज की सुन्दर व प्रेरक कहानी की तरफ़ , जिसका नाम है - ( ~ सच्चा साथी ~ )
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एक था नौजवान। देखने में सुंदर , स्वस्थ और आकर्षक था , परंतु कुसंगत में बिगड़ गया था। एक दिन मौसम सुहाना था। भीनी-भीनी हवा चल रही थी। नौजवान छत पर पतंग उड़ा रहा था कि डोर टूट गई , पतंग जंगल में एक साधु की कुटिया के पास जा गिरी। उसने पतंग उठाके कुटिया में रख दी। नौजवान वहीँ पहुँच गया।
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साधु से पूछा - " आपने यहाँ कोई पतंग गिरती तो नहीं देखी ? "
साधु ने कहा - " अंदर कुटिया में धरी है। तेरी है तो तू लेजा , मेरे किस काम की ! " पतंग उसे देते हुए साधु ने पूछा - " क्या रोज़ पतंग उड़ाते हो ? "
नौजवान ने उत्तर दिया - " नहीं जी ! जब यार लोग न आएँ , ताश और जुए का दौर न चले तो अकेला क्या करूँ ? "
साधु ने पूछा - " तू ताश और जुआ भी खेलता है ? "
नौजवान बोला - " जब पीने-पिलाने का अवसर न मिले , यार लोग भी आए हों , तब और क्या करें ? "
साधु चौंके - " तू शराब भी पिता है ? "
नौजवान ने बताया - " जब वेश्याओं के यहाँ नाच-गाने का अवसर न मिले , तब ! "
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साधु चिल्लाकर बोले - " तू गन्दी औरतों के यहाँ भी जाता है ? अरे , क्यों सर्वनाश के मार्ग पर बढ़े जा रहे हो ? यह तो मौत का रास्ता है , जीवन का नहीं। यह जो जवानी है न , एक बार चली गई तो दोबारा नहीं लौटती। क्यों नष्ट करते हो यौवन को ? आज तेरे शरीर में शक्ति है , आँखों में ज्योति है , मुखड़े पर आकर्षण है , हाथों में ताकत है। अभी तो तू पहाड़ों का सीना चीर सकता है , तूफानों को ललकार सकता है , सागरों का मंथन कर सकता है। परंतु यह शक्ति तो सदा रहती नहीं। ऐसा भी समय आएगा कि हाथ हिलाना चाहेगा तो हिलेगा नहीं , पाँव से चलना चाहेगा तो चलेंगे नहीं। आज तो आकाश के तारे भी गिन सकता है , परंतु शरीर ढल गया तो पास रखी लाठी भी दिखाई नहीं देगी। अब भी चेत ! "
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साधु की वाणी में प्रभाव था। नौजवान के मन पर चोट लगी। वह हाथ जोड़कर बोला - " महात्मन ! आप-जैसी बात कभी किसी ने कही नहीं। आपने तो मेरी आँखे खोल दीं। आप आज्ञा दें तो कभी-कभी आपके पास आ जाया करूँ ? "
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साधु बोले - " जब चाहो , आ सकते हो। मेरे यहाँ कोई रोक-टोक नहीं। "
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नौजवान नित्य ही साधु के पास आने लगा। साधु ने उसे यम , नियम , आसन , प्राणायाम , प्रत्याहार , धारणा , ध्यान आदि की बातें समझाईं। कई प्रकार के प्राणायाम का अभ्यास कराया। यह भी बताया कि प्राण को पाँव के अंगूठे से खींचके कैसे ब्रह्मरंध्र में पहुँचाया जाता है। सब-कुछ बताया , परंतु समाधि की विधि नहीं बताई। नौजवान ने एक दिन समाधि की विधि जानने की प्रार्थना भी की , परंतु महात्मा ने स्पष्ट कह दिया - " जब तक घर और संसार से माया का नाता नहीं टूटता , तब तक समाधि का कोई लाभ नहीं। "
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युवक बोला - " नाता कैसे टूटेगा ? यह तो एक सच्चाई है कि मेरी माँ है , पिता है , पत्नी है। "
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साधु ने कहा - " यह कोरा भ्रम है। न ये सदा से तेरे माता-पिता और कुटुंबी थे , न सदा रहेंगे। सच्ची माता , सच्चा पिता और सखा तो परमात्मा है। शास्त्र कहता है -
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                    त्वमेव माता च पिता त्वमेव , त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
                   त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव , त्वमेव सर्वं मम देव देव।।

अर्थात तू ही माता है , तू ही पिता है , तू ही बंधु है। तू ही सखा है , तू ही पाने-योग्य ( विद्या ) ज्ञानस्वरूप है , तू ही जीवन-धन ( द्रविणं ) है , तू ही मेरा सर्वस्व है , हे मेरे देवाधिपति देव ! "
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नौजवान बोला - " आप सत्य कहते हैं , परंतु यह भी तो सत्य है कि मेरे जन्मदाता भी हैं। उन्हें कैसे भूल जाऊँ ? पिता मेरे ऊपर प्राण निछावर करते हैं , माता मुझे देखे नहीं तो संसार उसके लिए अंधकारमय हो जाता है। पत्नी हर घड़ी मेरा नाम रटती है। आप कहते हैं यह भ्रम है ! "
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साधु ने कहा - " कोई तेरे लिए प्राण नहीं देता , कोई तेरे लिए बेचैन नहीं , कोई तेरा नाम नहीं रटता। सांसारिक प्रेम तो स्वार्थो का प्रेम है। सब अपने-अपने स्वार्थो के लिए तुझे चाहते हैं। जब तक शरीर में शक्ति और जेब में पैसा है , तभी तक ये रिश्ते-नाते हैं। "
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युवक बोला - " यह बात सच नहीं लगती। "
साधु ने कहा - " सच ही जानना चाहते हो तो आज घर जाते ही पलँग पर लेट जाना , प्राण रोक लेना। लाश बनकर पड़े रहना। कह देना - यदि तुम मर जाओ तो पहले तेरे गुरु को बुला लें , तब शमशान ले जाएँ। तुझे सारी सच्चाई मालूम हो जाएगी। "
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नौजवान घर गया। तबीयत खराब होने का बहाना करके लेट गया। माँ से कह दिया - " लगता है अब बचूँगा नहीं। यदि मुझे कुछ हो गया तो शमशान ले-जाने से पहले मेरे गुरूजी को बुला लेना। "
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माँ बोली - " शुभ-शुभ बोल ! तुझे कुछ नहीं होगा। थोड़ी देर आराम कर ले , भला-चंगा हो जाएगा। "
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युवक ने चादर ओढ़ ली। प्राणायाम करके प्राण चढ़ा लिये। साँस रुक गई। शरीर ठंडा होता गया।
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कुछ देर बाद पत्नी आई तो उसे बुलाया , हिलाया , नब्ज़ देखी और चीखती हुई बाहर को भागी - " माता जी****माता जी , अंदर देखो क्या जो गया है ! "
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माँ ने देखा तो छाती पीटने लगी। 
पिता ने वैद्य , हकीम और डॉक्टर बुलाए। सबने जाँचा और कहा - " यह तो समाप्त हो चुका ! "
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घर में रोना-पीटना शुरू हो गया। मुहल्ले के लोग आ गए। सभी कहने लगे - " कितना सुधर गया था यह नौजवान ! जब से साधु महात्मा के पास गया , इसका जीवन ही सँवर गया। सबके साथ मीठा बोलता था। सबके काम आता था। अब तो यह केवल मिट्टी है , ले चलो शमशान , नहीं तो लाश से बदबू आने लगेगी। "
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नहलाया गया युवक को। कफ़न ओढ़ाया गया। अर्थी उठने से पहले माँ बोली - " अरे ठहरो जरा ! इसने कहा था - शमशान जाने से पहले इसके गुरु को बुला लेना। "
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साधु को लाया गया। उन्होंने कफ़न उठाया। युवक को टटोला। तब कहा - " मर तो गया है , परंतु बाख सकता है। यदि कोई दूसरा आदमी जान देने को तैयार हो तो मैं यमदूतों से कह सकता हूँ कि इसे छोड़ दें , दूसरे को ले जाएँ। " झोले से मिश्री की पुड़िया निकालकर कहा - " यह विष की पुड़िया है। कोई भी इसे दूध में घोलकर पि ले। "
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सभी एक-दूसरे का मुँह तकने लगे।
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माँ बोली - " मैं मर तो जाऊँ , परंतु पहले मेरी जन्मपत्री देख लो। यदि मेरे भाग्य में और संतान होना लिखा है तो मैं काहे को मरुँ ? "

पिता बोला - " मैं पी तो लूँ यह विष , परंतु मेरा व्यापार बहुत फ़ैल गया है। मेरे सिवाय कोई सँभालने वाला नहीं। इसलिए विष नहीं पि सकता। "

पत्नी ने कहा - " मेरी कोख में मरने वाले की निशानी है। आप उसे भी मेरे साथ मारना चाहते है तो कर लूँगी विष-पान। "
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साधु बोले - " जब कोई भी विष पीने को तैयार नहीं तो यह जिएगा कैसे ? आप दूध लाओ , तब तक मैं सोचता हूँ कि कौन पिए यह विष। "

मुहल्ले के लोग एक-एक करके खिसकने लगे कि कहीं उनकी बारी न आ जाए। 

साधु ने कहा - " जब कोई नहीं पीता तो शायद मुझे ही पीना पड़ेगा। "
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एक-साथ कितने ही बोल उठे - " हाँ-हाँ महाराज , आप ही पी लो ! " अभिप्राय यह है कि आप ही मरो , हमें मरने का अवकाश नहीं। 
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साधु ने दूध में मिश्री घोली और पी गए। उसमें विष था ही नहीं तो मरते कैसे ?

उधर युवक ने ब्रह्मरंध्र से प्राण उतारे और उठ बैठा। उसने कहा - " गुरुदेव ! आप सच कहते थे कि ये रिश्ते-नाते स्वार्थों के कारण हैं। कोई किसी के लिए नहीं मरता। सच्चा साथी केवल " परमात्मा " है। "   
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                                                   कहानी लेखक - महात्मा श्री आनंद स्वामी

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मित्रों व प्रिय पाठकों - कृपया अपने विचार टिप्पणी के रूप में ज़रूर अवगत कराएं - जिससे हमें लेखन व प्रकाशन का हौसला मिलता रहे ! धन्यवाद !


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27 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. कौशल भाई धन्यवाद व सद: ही स्वागत हैं !
      ॥ जय श्री हरि: ॥

      हटाएं
  2. उत्तर
    1. सर धन्यवाद व स्वागत हैं !
      ॥ जय श्री हरि: ॥

      हटाएं

  3. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (25.04.2014) को "चल रास्ते बदल लें " (चर्चा अंक-1593)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, वहाँ पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. राजेंद्र सर बहुत बहुत धन्यवाद व स्वागत हैं !

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  4. सुंदर शिक्षाप्रद कहानी ! बहुत बढ़िया !

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    उत्तर
    1. आ. धन्यवाद व स्वागत है !
      || जय श्री हरिः ||

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  5. बहुत सुंदर एवं शिक्षाप्रद कहानी.

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    उत्तर
    1. राजीव भाई धन्यवाद व स्वागत हैं !

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  6. बहुत सुन्दर शिक्षाप्रद प्रस्तुति ..

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    उत्तर
    1. आ. प्रकाशन मैंने कर दिया बाकी तारीफ तो लेखक की ही होनी चाहिए और इस कहानी के लेखक महात्मा श्री आनंद स्वामी जी हैं ! धन्यवाद व स्वागत हैं !
      ॥ जय श्री हरि: ॥





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  7. बहुत ही सार्थक पोस्ट जो कठिन श्रम के बाद बहुत ही सुन्दर तरह आपने उल्लेखित किया है
    हार्दिक बधाई आपको भाई ''आशीष'' जी।


    एक नज़र :- हालात-ए-बयाँ : ''भोलू का भोलापन''

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    उत्तर
    1. अभिषेक ब्रदर धन्यवाद व सद: ही स्वागत हैं !

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  8. उत्तर
    1. सनी ब्रदर , धन्यवाद व स्वागत हैं !

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  9. बहुत सुंदर एवं शिक्षाप्रद कहानी

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    उत्तर
    1. संजय भाई बहुत बहुत धन्यवाद जो आपका आगमन हुआ व सद: ही स्वागत हैं !

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  10. सार्थक ... रोचक शिक्षाप्रद कहानी ....

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    उत्तर
    1. दिगंबर भाई जी धन्यवाद व स्वागत हैं !

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  11. आशीष भाई प्रेरक बोध कथा। यहां कोई किसी का पिता पुत्र बेटा पति पत्नी नहीं हैं ये सब माया का कुनबा है।

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  12. उत्तर
    1. नवीन भाई धन्यवाद व स्वागत हैं !

      हटाएं
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